बचपन मे जब तर्क,वितर्क की समझ आयी तो धार्मिक रूप से बुद्ध ने सबसे पहले प्रभावित किया,,,
निसंदेह बुद्ध परम तार्किक व्यक्ति है, बुद्ध ने समाज को देखा,उसकी भाग दौड़,महत्वकांछा,
अपनो की मृत्युं, भुकमरी,डकैती,चोरी,सूखा, बीमारी,आकस्मिक आपदा में समाज घिरा है,,,
और ऐसा नही है ऐसी दृष्टि सिर्फ बुद्ध के ही पास है,,,,बल्कि हम सबके पास है लेकिन हम अनावश्यक व्यस्त होकर उस भावना को दबा देते है,विमुख हो जाते है,,,
जिस दुख से मनुष्य जीवन भी भागता रहता है,,, उसी दुःख को बुध सबसे पहले सामने खड़ा कर देते है, जिस दुःख से जीवन भर दो,दो हाथ करना है उससे बुद्ध सबसे पहले परिचय करा देते है,,,
वास्तव में हम अपनी परछाई को पकडने को कितनी भी तेज भागे,और कितने ही लंबे समय तक भागे वह पकड़ में आने वाली नही,,,, उसी परछाई के पीछे सदियो से सारी मनुष्यता लगी है,,
, हमने स्पीड तेज़ कर ली, भोग विलास के संसाधन बाढ़ा लिए,,, लेकिन परछाई पकड़ ही नही आती,,, उसी परछाई को से बुद्ध परिचय कराते है,,, यदि परछाई का व्यवहार हम जानेंगे तो उसे जीत भी लेंगे,,, उसे काबू में कर लेंगे,,
दुःख है,,,, के स्वीकार्य से हमारा अपनी परछाई से परिचय होता है,,, क्रमशः
बुद्ध पूर्णिमा