Wednesday, 26 May 2021

बुद्ध पूर्णिमा

  बचपन मे जब तर्क,वितर्क की समझ आयी तो धार्मिक रूप से बुद्ध ने सबसे पहले प्रभावित किया,,,
     निसंदेह बुद्ध परम तार्किक व्यक्ति है, बुद्ध ने समाज को देखा,उसकी भाग दौड़,महत्वकांछा,
अपनो की मृत्युं, भुकमरी,डकैती,चोरी,सूखा, बीमारी,आकस्मिक आपदा में समाज घिरा है,,, 
 और ऐसा नही है ऐसी दृष्टि सिर्फ बुद्ध के ही पास है,,,,बल्कि हम सबके पास है लेकिन हम अनावश्यक व्यस्त होकर उस भावना को दबा देते है,विमुख हो जाते है,,,
 जिस दुख से मनुष्य जीवन भी भागता रहता है,,, उसी दुःख को बुध सबसे पहले सामने खड़ा कर देते है, जिस दुःख से जीवन भर दो,दो हाथ करना है उससे बुद्ध सबसे पहले परिचय करा देते है,,, 
   वास्तव में हम अपनी परछाई को पकडने को कितनी भी तेज भागे,और कितने ही लंबे समय तक भागे वह पकड़ में आने वाली नही,,,, उसी परछाई के पीछे सदियो से सारी मनुष्यता लगी है,,
, हमने स्पीड तेज़ कर ली, भोग विलास के संसाधन बाढ़ा लिए,,, लेकिन परछाई पकड़ ही नही आती,,, उसी परछाई को से बुद्ध परिचय कराते है,,, यदि परछाई का व्यवहार हम जानेंगे तो उसे जीत भी लेंगे,,, उसे काबू में कर लेंगे,,
   दुःख है,,,, के स्वीकार्य से हमारा अपनी परछाई से परिचय होता है,,, क्रमशः
                                          बुद्ध पूर्णिमा

Saturday, 22 May 2021

नस्लवादी धर्म

मुख्यता तीन धर्म नस्लवादी है,,, पारसी,यहूदी और ब्राह्मण धर्म,,,, जिसमे पारसी धर्म नस्लवादी होते हुवे भी शान्ति पसंद लगता है,,, 
     इसके उलट यहूदी और ब्राह्मण धर्म विश्व मे शासन के लिए निरंतर जोड़तोड़ में लगे रहते है,,,,
     विडंबना ये है कि कोई नस्ल के बाहर से आने वालो के लिए द्वार पूर्णतया बंद है इसलिए इनकी जनसंख्या लगभग नदघ्य ही है,,, भारत मे जो ब्राह्मण धर्म की जनसंख्या बताई जाती है वह सिर्फ कागज़ में ही दिखती है,, क्योकि आदिवासी,दलित पूर्णतया खुद को अलग मानते है,,, ओबीसी स्वर्ण के भी नस्ल विषेशाधिकार चिढ़ाता रहता है,,,,
    जबकि बौद्ध,इसाई और मुस्लिम धर्म के साथ,साथ नास्तिको के द्वार सभी मनुष्यों के लिए खुले है,,,, इसलिए इनकी जनसंख्या भी विशाल है और इनके देश भी अनेको है,,, क्रमशः

Wednesday, 3 March 2021

मानसिक विचरण

 आडवाणी जी ने जब रथ यात्रा निकाली और सारे देश में एक उन्मादी धार्मिक माहौल जैसा वातावरण बन गया, फिर अक्सर अयोध्या,फैज़ाबाद में लाखो कारसेवको की भीड़ एकत्रित होने लगी और एक राष्ट्रवादी पार्टी पोषित होने लगी,,, 
   मैं सोचता था,,, ये सब समाज का सहज घटनाक्रम है इससे समाज पर कोई खास फर्क पड़ने वाला नही,,, क्योकि ज़िंदगी फिर सामान्य रूप से चलने लगती थी,,, 
  जब देश के कोने,कोने से लाखों कारसेवको को समय,समय पर एकत्रित करने का जतन किया जाता था, तो कुछ समय के लिए देश रुक सा जाता था,,, सारे देश मे एक उन्माद सा वातावण बन जाता था, लेकिन सामान्य सी ज़िंदगी फिर चल पड़ती थी,,, 
   हालांकि मैं सामाजिक संगठनों में सक्रिय रहता था, लेकिन हमारे पास नुकसान को मापने की कोई 
दृस्टि या समझ नही थी,,,
    लेकिन आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं तो समझ आता है कि हमने क्या,क्या खोया है,,,
                             क्रमशः